शेयर्ड कम्प्यूटिंग को `डेस्कटॉप वर्चुअलाइजेशन' भी कहते हैं। इस तकनीक से एक मुख्य कम्प्यूटर में कुछ विशेष हार्डवेयर और सॉप्टवेयर डालकर डिवाइस की मदद से कई क्लाइंट कम्प्यूटर जोड़े जाते हैं। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें विंडोज और अन्य एप्लीकेशन केवल सर्वर कम्प्यूटर पर लोड करने पड़ते हैं और क्लाइंट कम्प्यूटर के रूप में केवल डेस्कटॉप, माउस और की-बोर्ड की जरूरत होती है। इसके बाद एक सीपीयू से करीब तीस लोग काम कर सकते हैं और वे सभी एप्लीकेशन भी एक्सेस कर सकते हैं जो सर्वर कम्प्यूटर पर लोड हैं। यह तकनीक स्कूलों, अस्पतालों, निजी या सरकारी संगठनों और कार्यालयों के लिए बहुत लाभदायक और सस्ती पड़ती है, जहां कई कम्प्यूटरों का प्रयोग होता है।
एन-कम्प्यूटिंग नामक एक अमेरिकी कंपनी, अब तक शेयर्ड कम्प्यूटिंग तकनीक से दुनियाभर के 40 हजार स्कूलों और संस्थानों में कम्प्यूटर लगा चुकी है। इसके साथ ही कंपनी ने भारत में बिहार सरकार के साथ करार कर शेयर्ड कम्प्यूटिंग तकनीक की मदद से सैकड़ों स्कूलों में कम्प्यूटर स्थापित करने की योजना बनाई है। आंध्रप्रदेश और राजस्थान में भी कंपनी ने सरकार के साथ मिलकर कम्प्यूटर शिक्षा की पहल की है।
सौजन्य: इलेक्ट्रोनिकी
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