आज क्यूँ ऐसा सोचता हूँ की एक बार फ़िर कुछ लिखूं। काफी व्यस्त जिंदगी हो गई है या फ़िर मैंने कर ली है जानबूझकर, ये तो मालूम नही। खैर, लिखने का मौका मिला; भगवान का शुक्र है।
दराअशल, आज ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत रास्त्रपति बने और शायद इस बाबत मैं लिखने को मजबूर हो गया। आज इस शख्स के जीत ने लोंगों को बरबस ही इनका वो कथन याद दिला दिया जिसमें उसने कहा था।
उनके शब्द कुछ यूँ थे की अमेरिका श्वेत या श्याम रंग के लोंगों के लोंगों के लिए नही बना, यह न ही लातिनों का है और न ही एशिअनों का, ये संकीर्ण या ओछी विचारधारा पर पर भी यकीं नही करता। यह सही मायनों मैं संयुक्त हैं और इसकी पहचान सिर्फ़ अमेरिका नही बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका से है।
विशेषकर भारतीयों के बीच इस तरह की बात चर्चा मैं थी की ये शायद भारत विरोधी विचारधारा रखते हैं। लेकिन, अब ये भी सिर्फ़ अफवाह लगती है। वो गाँधी के आदर्शों को पसंद करते हैं और महाभारत का ज्ञान उन्हें अपनी दादी से मिला है।
इन घटनाक्रमों को देखकर ऐसा महसूस होता है की दुनिया शायद एक सम्पूर्ण परिवर्तन के दौर मैं प्रवेश कर रही है। वर्तमान समयकाल शायद संक्रमण का काल है और शायद बराक ओबामा भी गीता सार के उन विचरों से अवगत होंगे की जो होगा अच्छे के लिए होगा। इसलिए हमें भी ये मानकर चलना चाहिया की आनेवाले कल मैं हमारे संबंध अमेरिका के साथ जैसे भी रहें वो अच्छे के लिए ही होंगे।
Wednesday, November 5, 2008
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