Monday, December 14, 2009

आपके मौबाइअल का अगला पराव

आज आपका परिचय एक नए अंग्रेजी शब्द से करवाता हूँ, "Geo-Informatics" ...
दरअसल, आजकल यही शब्द मेरे जीविका का आधार बना हुआ है। हिन्दी-भाषी इस शब्द को "भूगोल" से जोर कर देख सकते हैं। सूचना-क्रांति के इस युग मैं भला "भूगोल" भी कब तक कंप्यूटर से दूर रह पता... बस जैसे ही ये दोनों मिले, "Geo-Informatics" अस्तित्व में आ गया। अब आप सोच रहे होंगे भला एक आम आदमी का इससे क्या नाता?

१) हमारे संयुक्त परिवार में जमीन को लेकर विवाद तो आम बात होगी। क्या कुछ नही करते हम, कभी सीमा पर बाबुल का तो नीम का पेर लाग देते हैं, कभी कंटीले तार, और पता नही क्या-क्या लेकिन फ़िर भी लाठियां तो चल ही जाती है। लेकिन तकनीक के पंचायत में न्याय की पूरी गारंटी है। अगर हमारी सरकार ने इस तकनीक को अपनाया तो यकीन मानिये के इंच की भी गलती की गुन्जयास नही होगी। क्यूँ, चौंक गए न?
२) यूँ तो आपको यह सन्दर्भ मजाकिया लगेगा लेकिन ज़रा सोचिये अगर ये तकनीक सस्ती और सुलभ हो जाए जैसे की आज हर हाथ मैं मौबाइअल है, तो इस तकनीक की मदद से आप अपने मवेशी पर नज़र रख पाएंगे की वो अपनी सीमा के अन्दर हैं या बाहर। न सिर्फ़ जानवर बल्कि आप अपने घर के नन्हे शैतानों पर भी नज़र रख पायेंगे।
३) घर मैं अगर दादा जी बीमार हैं और मज़बूरी है की घर के सभी शख्स नौकरी-शुदा हैं, तो परेशान होने की कोई जरुरत नही, ये तकनीक दादा जी के स्वस्थ के बारे मैं आपको पल-पल सूचित करती रहेगी।

ऐसा नही है की सूचि बस तीन तक की गिनती मैं ही सिमट चुकी है। यकीन मानिये, ये बस कुछ बहुत ही सामान्य से उदाहरण हैं, सामान्य शब्दों में इस नै तकनीक के बारे मैं आपको जानकारी देने की। विकशित देशों मैं इसे ही 4-G कहा जा रहा है। यानी की आपके मौबाइअल का अगला पराव।

Monday, December 7, 2009

हिन्दी-भाषी की अदभुत मानसिकता !

बहुत दिन हो गए। चलो, एक बार फ़िर से दो बातें कर लें। जब इस ब्लॉग की शुरुआत की थी तो सोचा था, इसी बहने कुछ हिन्दी मैं बतिया लिया करेंगे। लेकिन, लगता है, ज्यादती कर दी मैंने, अपना वादा जो भूल गया।

फ़िर आज अचानक कैसे? हाँ भाई, कभी-कभी ख़ुद से बात करने का मौक़ा मिल ही जाता है और फ़िर कितनी दूर भागोगे अपने आप से? दरअसल बात कुछ यूँ है की पत्रकारिता मैं स्नातक करने के बाद जब सोफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करनी शुरू कर दी तो लगभग नामुमकिन सा लगने लगा था वापस पत्रकारिता में आना। लेकिन, आज महानायक अमिताभ बच्चन का एक डायलोग याद आता है "सच बड़ा ही अजीबोगरीब होता है ये सच अक्सर, असामान्य अद्भुद कल्पना से भी ज्यादा विचित्र होता है यह सच अक्सर"। हाँ भाई, मेरी किस्मत ने मुझे एक पत्रिका से जोड़ दिया है। लेकिन, विडम्बना देखिये की अभी भी हिन्दी ने नही बल्कि अंग्रेजी ने अपनाया है। कभी-कभी सोचता हूँ की हिन्दी से हिन्दी प्रेमियों को आख़िर दूर कौन कर रहा है?

नाम नही बताऊंगा लेकिन कुछ ख़ास और कुछ आम जान-पहचान वाले लोग मीडिया से जुरे लोग गलती से ही सही लेकिन इस तथ्य को जरुर काबुल करते हैं की दरअसल "हिन्दी मीडिया" भी कुछ बिचौलियों के जाल में उलझ कर रह गई है। ऐसे लोग जो हिन्दी को अंग्रेजी और अंग्रेजी को हिन्दी से जोरने में महारथ हासिल कर रखे हैं। यकीन न आए तो आप कुछ नामी-गिरामी हिन्दी और अंग्रेजी के पत्रकारों के नाम गूगल में टाइप करके देख लीजिये। अंग्रेजी में टाइप करके देखिएगा तो उनकी अंग्रेजी लेखनी और अंग्रेजी विचार सामने आयेंगे फ़िर जब हिन्दी में टाइप कीजियेगा तो हिन्दी विचार सामने आयेंगे। आपको सावधानी बस एक ही बरतनी होगी, कृपया उन दोनों ही लेखनी की तुलना किसी भी दृष्टि से न करें। यह कोई चेतावनी नही, महज सलाह है। भाई जनतंत्र है, चेतावनी देने की हिम्मत कौन करे।

उफ़, लगता है में कुछ ज्यादा ही बोल दिया, आप सोच रहे होंगे भरांस निकाल रहा है। किसी हिन्दी पत्रकार ने शायद इसकी "मार-ली" है। भाई, आपकी इस सोच का मुझको कोई दुःख नही, अपनी बात कहने का दिल किया तो कह दी। बांकी, दुनिया की मर्जी, "ज़ले या बुझी अपनी बला से"। कितना स्वार्थी हो गया हूँ में, कितनी बेवाक बातें कर देता हूँ, कभी-कभी।

खैर! असल बात तो कहना भूल ही गया। दोस्तों, स्नातक में हिन्दी पत्रकारिता से की है और नौकरी विज्ञान विषय की एक अंग्रेजी पत्रकारिता में कर रहा हूँ। काफ़ी इज्ज़त दी है अंग्रेजी वालों ने, उप-संपादक का पद दिया है, कृतज्ञ बना दिया है, मुझे। शायद, हिन्दी की बेवफाई ने इतना कुछ कहलवा दिया। माफ़ करना, लेकिन सोचना जरुर। आख़िर हिन्दी अपनों से ही इतनी दूर क्यूँ जा रही है।

आज ही एक ख़बर पढ़ी "Google launches contest to promote Hindi content on इन्टरनेट"। क्यूँ खुस हो गए होंगे आप की वाह क्या बात है, इन्टरनेट पर हिन्दी के लिए क्या कुछ नही हो रहा। लेकिन में बिल्कुल खुस नही हुआ। सचमुच बहुत ही दुःख होता है ये सोचकर की हिन्दुस्तान के अन्दर एक बाहर का आदमी जब आकर "हिन्दी" की बात करता है तो हम इसपर गर्व करते हैं लेकिन आपस में ही हिन्दी के नाम पर किसी भी सड़क-छाप नेता के बहकाने पर लड़ना शुरू कर देते हैं। समझ नही आता, क्या हम हिन्दुस्तानी मानसिक रूप से इतने दिवालिया हो गए हैं की किसी की भी बातों में आ जाते हैं। आखिकार ये कब-तक चलेगा की ख़ुद के घर को बनने और सजाने के लिए भी माइक्रोसॉफ्ट और गूगल की तरफ़ हम निहार रहे होंगे। क्या इसी सोच के साथ हम दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनने का ख्वाब देख रहे हैं। अगर ऐसा हो, तो मुझे शर्म आ रही है हिन्दुस्तानी और हिन्दी-भाषी बनने में।

Friday, May 15, 2009

चुनाव २००९: क्या हम सचमुच गंभीर हैं

हमेशा की तरह आज भी शायद हमने खुद को एकबार आईने में देखा तो सही लेकीन गौर से नही, बात बहुत मामूली है और पेचीदा भी। पन्द्रवी आम चुनाव समाप्त हो चुके हैं और अब गिनती की कार्य प्रारम्भ होने वाला है। मैंने भी अपना अधिकार का प्रयोग करते हुए वोट दिया लेकिन चुनाव आयोग प्रदत्त ४९-० का प्रयोग किया। खैर! मुझे इस बात का पुरा अहसास था की मैंने ऐसा करके भले ही कुल वोटिंग की गिनती मैं कुछ वृद्धि कर दूँ लेकिन परिणाम पर कोई फर्क नही पर्ने वाला। जॉन एल्लिओत साहब की ब्लॉग (द राडिंग एलेफंत) पर उनका आलेख पढ़ा और उसमें उन्होंने जो बातें लिखीं वो सचमुच एक भयानक लोकतान्त्रिक विपदा की तरफ़ इशारा कर रही है।

उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक रास्त्र भारत के लोकतान्त्रिक उत्सव की समीक्षा करते हुए, इस बार के चुनाव के मुद्दों के ऊपर गंभीर टिप्पणी की है। जॉन कहते हैं की मुझे याद है मुंबई के धमाके और लोगों का गुस्सा लेकिन ये क्या चुनाव मैं इसका कोई जिक्र ही नही। नंदीग्राम की आग, पता नही वो भी इतनी जल्दी कैसे बुझ गई। चलिए अब देश से बाहर निकलते हुए दुनिया की बातें करते हैं। चारों तरफ़ आर्थिक मंदी का दौर लेकिन ये क्या भारत के आम चुनाव मैं ये भी मुद्दा नही बन सका। मैं कुछ बातें और भी इसमे जोरना चाहूँगा। पकिस्तान के हालात, नेपाल में राजनितिक संकट और सबसे महत्वपूर्ण बात भारत के अन्दर अलगाववाद की राजनीति (राज ठाकरे जैसे नेताओं द्बारा प्रायोजित ), विडम्बना ये हैं की इनमें सो कुछ भी मुद्दा इस आम चुनाव मैं देखने को नही मिला। पप्पू कान्त डांस के तर्ज़ पर पप्पू कान्त वोट तो काफी सुनाई दिया लेकिन आरक्षण की आग भी चुनाव के बयार मैं कहीं न दिखी न सुनी गई।

सचमुच ये काफी खतरनाक समय है और इसका सही आंकलन तो चुनाव के नतीजों के बाद ही दिखाई देगा। देखना ये है की नेताओं के प्रायोजित मुद्दे ही जनता का भी मुद्दा रहा या फ़िर जनता ने चुपचाप एक ऐसी सज़ा सुना दी है भ्रस्त नेताओं को जो उन्हें चौंका देगी।