भारत सरकार ने 100 से अधिक कंपनियों को अनिवार्य तौर पर कॉस्ट ऑडिट कराने का आदेश दिया है। किसी कंपनी की उत्पादन लागत और प्रॉफिट मार्जिन के सरकारी निरीक्षण की व्यवस्था को कॉस्ट ऑडिट कहा जाता है। अभी तक इसका दायरा सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग, माइनिंग और सर्विसेज जैसे सेक्टरों से जुड़े 44 उत्पादों तक सीमित, ज़ो अब बढ़ा दिया गया है।
सरकार के इस कदम का मकसद यह जानना है कि ये कंपनियां पैसे का कितने सही तरीके से इस्तेमाल करती हैं। यह कदम इस लिहाज से भी अहम है कि अपने उत्पादों और सेवाओं के लिए कंपनियों की ओर से वसूले जा रहे दाम को लेकर सरकार कुछ असहज महसूस कर रही है।
विभाग ने कंपनी कानून की धारा 233 बी के तहत आदेश जारी किया है। इस धारा के तहत सरकार कंपनियों से जरूरी पड़ने पर ऑडिट की मांग कर सकती है। कॉस्ट ऑडिट रिपोर्ट में गड़बड़ी पाए जाने पर सरकार कंपनी रजिस्ट्रार से किसी भी कंपनी के खातों की जांच करने को कह सकती है।
कॉस्ट ऑडिट रिपोर्ट में सामग्री, यूटिलिटीज, कर्मचारियों पर खर्च, डेप्रिसिएशन, रॉयल्टी, शोध पर खर्च, निर्यात बोनस, कर्ज की लागत और कंपनी के आंतरिक लेनदेन की विस्तृत जानकारी को शामिल किया जाता है।
इन आंकड़ों की मदद से कंपनियां अपनी क्षमता में सुधार कर पाती हैं और वहीं इससे सरकार को अपनी नीतियों को आकार देने में मदद मिलती है।
विशेषज्ञों के एक समूह ने 50 करोड़ रुपए से अधिक कारोबार करने वाली सभी कंपनियों को अनिवार्य तौर कॉस्ट ऑडिट खाता रखने का सुझाव दिया है। इस समय पेपर, चीनी सहित 44 उत्पादों से जुड़ी कंपनियों को ही इस दायरे में लाया गया है।
सौजन्य: ET
Tuesday, December 28, 2010
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