आज सुबह अख़बार मैं पढ़ा की भारतीय क्रिकेट जगत के भगवन माने जाने वाले सचिन के कमेंट्स जो शायद दिरेक्ट दिल से कहे गए थे। दर असल, सचिन जिस युग का प्रतिनिधितव्य करते हैं, अब उस युग के अकेले योधा मैदान मैं हैं और कहीं न कहीं ये बात उनके दिल को भी कचोट रही है की उनके कैरीयर का अंत भी अब ज्यादा दूर नही है। इसलिए ये बातें लाजिमी हैं की अंत समय मैं सफर के सभी साथी याद आयें। लेकिन, ये क्या मैं कहना से कुंबले के बारे मैं चाह रहा था और बातें सचिन की किए जा रहा हूँ। असल मैं सचिन होने का मतलब ही यही होता है की क्रिकेट की कोई भी बात उनके नाम के बिना पुरी ही नही होती तो, फ़िर कुंबले होने का मतलब क्या है?
कुंबले का मतलब होता है वो जज्बा जो टूटे हुए जबरे के साथ भी मैदान मैं बैखोफ उतरे और मैच का रुख मौर दे, यह वो जज्बा है की अकेले ही सभी दस विकेट अपने बूते उखर दे, ये वो जज्बा है की लगातार अठारह साल तक अपने को साबित करता आया है लेकिन दुःख भी होता है ये सुनकर जब क्रिकेट के जानकर उन्हें उनकी असल पहचान देने से हिचकते हैं और वो पहचान है फिरकी गेंदबाज़ कहलाना। हालाँकि आंकरों के हिसाब से तो उन्होंने वार्ने और मुरलीधरन के बाद अपनी जगह पक्की कर ही ली है।
इस तरह मैं तो ये जरुर कहूँगा की कुंबले ने क्रिकेट को अलविदा कहते हुए ये कहने की मजबूर कर ही दिया है की भैया तुम पसंद करो या न करो लेकिन फिरकी जगत मैं अब ये नाम ही काफ़ी है। उन्होंने एक बड़ी ही अनूठी परिकल्पना स्थापित की है की आज का दौर सिर्फ़ प्रतिभा का दौर नही बल्कि आपकी प्रतिबधता और सतत लगन परिश्रम से मुकाम हासिल करने का दौर है। तभी तो लॉर्ड्स जैसे मैदान पर जाकर यह खिलारी शतक भी जमा आता है, जहाँ बड़े-बड़े बल्लेबाज़ पस्त हो चुके होते हैं। शायद, कुंबले बाद अब सहवाग एक ऐसा खिलारी है जो कुंबले के बाद इस परिकल्पना को आगे बढ़ाने का माद्दा रखते हैं। क्यूंकि गौरतलब हो तकनिकी रूप से वो भी पूर्ण बल्लेबाज़ नही माने जाते।
कुंबले ख़ुद एक इंजिनियर हैं और एक और बात उन्होंने पूरी सफलता के साथ स्थापित की है की एक प्रतिभाशाली दिमाग हमेशा अपने लिए कुछ अलग पहचान बना ही लेते है। भले ही कुंबले इंजिनियर का दिमाग सामान्य इंजिनियर की तरह न किया हो लेकिन मैदान पर इसने बलेबाजों को अपनी बुद्धिमता का लौह जरुर मनवाया। मुझे नही मालुम की उन्होंने अपने आगे के भविष्य के लिए क्या योजनायें बना रखे हैं। लेकिन इतना यकीन है की ये योधा किसी भी क्षेत्र मैं अपनी एक अलग पहचान बनाने का माद्दा जरुर रखता है। इसमें कोई बड़ी बात नही की कल ये फ़िर अपने मूल क्षेत्र यानी की विज्ञानं और तकनीक मैं कुछ कमाल कर जाए। कुंबले को उनके सुनहरे भविष्य की बहुत सारी शुभकामनाएँ।
Friday, November 7, 2008
Wednesday, November 5, 2008
एक नई शुरुवात
आज क्यूँ ऐसा सोचता हूँ की एक बार फ़िर कुछ लिखूं। काफी व्यस्त जिंदगी हो गई है या फ़िर मैंने कर ली है जानबूझकर, ये तो मालूम नही। खैर, लिखने का मौका मिला; भगवान का शुक्र है।
दराअशल, आज ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत रास्त्रपति बने और शायद इस बाबत मैं लिखने को मजबूर हो गया। आज इस शख्स के जीत ने लोंगों को बरबस ही इनका वो कथन याद दिला दिया जिसमें उसने कहा था।
उनके शब्द कुछ यूँ थे की अमेरिका श्वेत या श्याम रंग के लोंगों के लोंगों के लिए नही बना, यह न ही लातिनों का है और न ही एशिअनों का, ये संकीर्ण या ओछी विचारधारा पर पर भी यकीं नही करता। यह सही मायनों मैं संयुक्त हैं और इसकी पहचान सिर्फ़ अमेरिका नही बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका से है।
विशेषकर भारतीयों के बीच इस तरह की बात चर्चा मैं थी की ये शायद भारत विरोधी विचारधारा रखते हैं। लेकिन, अब ये भी सिर्फ़ अफवाह लगती है। वो गाँधी के आदर्शों को पसंद करते हैं और महाभारत का ज्ञान उन्हें अपनी दादी से मिला है।
इन घटनाक्रमों को देखकर ऐसा महसूस होता है की दुनिया शायद एक सम्पूर्ण परिवर्तन के दौर मैं प्रवेश कर रही है। वर्तमान समयकाल शायद संक्रमण का काल है और शायद बराक ओबामा भी गीता सार के उन विचरों से अवगत होंगे की जो होगा अच्छे के लिए होगा। इसलिए हमें भी ये मानकर चलना चाहिया की आनेवाले कल मैं हमारे संबंध अमेरिका के साथ जैसे भी रहें वो अच्छे के लिए ही होंगे।
दराअशल, आज ओबामा अमेरिका के पहले अश्वेत रास्त्रपति बने और शायद इस बाबत मैं लिखने को मजबूर हो गया। आज इस शख्स के जीत ने लोंगों को बरबस ही इनका वो कथन याद दिला दिया जिसमें उसने कहा था।
उनके शब्द कुछ यूँ थे की अमेरिका श्वेत या श्याम रंग के लोंगों के लोंगों के लिए नही बना, यह न ही लातिनों का है और न ही एशिअनों का, ये संकीर्ण या ओछी विचारधारा पर पर भी यकीं नही करता। यह सही मायनों मैं संयुक्त हैं और इसकी पहचान सिर्फ़ अमेरिका नही बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका से है।
विशेषकर भारतीयों के बीच इस तरह की बात चर्चा मैं थी की ये शायद भारत विरोधी विचारधारा रखते हैं। लेकिन, अब ये भी सिर्फ़ अफवाह लगती है। वो गाँधी के आदर्शों को पसंद करते हैं और महाभारत का ज्ञान उन्हें अपनी दादी से मिला है।
इन घटनाक्रमों को देखकर ऐसा महसूस होता है की दुनिया शायद एक सम्पूर्ण परिवर्तन के दौर मैं प्रवेश कर रही है। वर्तमान समयकाल शायद संक्रमण का काल है और शायद बराक ओबामा भी गीता सार के उन विचरों से अवगत होंगे की जो होगा अच्छे के लिए होगा। इसलिए हमें भी ये मानकर चलना चाहिया की आनेवाले कल मैं हमारे संबंध अमेरिका के साथ जैसे भी रहें वो अच्छे के लिए ही होंगे।
Tuesday, November 4, 2008
Tuesday, June 3, 2008
Monday, June 2, 2008
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