Friday, May 15, 2009

चुनाव २००९: क्या हम सचमुच गंभीर हैं

हमेशा की तरह आज भी शायद हमने खुद को एकबार आईने में देखा तो सही लेकीन गौर से नही, बात बहुत मामूली है और पेचीदा भी। पन्द्रवी आम चुनाव समाप्त हो चुके हैं और अब गिनती की कार्य प्रारम्भ होने वाला है। मैंने भी अपना अधिकार का प्रयोग करते हुए वोट दिया लेकिन चुनाव आयोग प्रदत्त ४९-० का प्रयोग किया। खैर! मुझे इस बात का पुरा अहसास था की मैंने ऐसा करके भले ही कुल वोटिंग की गिनती मैं कुछ वृद्धि कर दूँ लेकिन परिणाम पर कोई फर्क नही पर्ने वाला। जॉन एल्लिओत साहब की ब्लॉग (द राडिंग एलेफंत) पर उनका आलेख पढ़ा और उसमें उन्होंने जो बातें लिखीं वो सचमुच एक भयानक लोकतान्त्रिक विपदा की तरफ़ इशारा कर रही है।

उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक रास्त्र भारत के लोकतान्त्रिक उत्सव की समीक्षा करते हुए, इस बार के चुनाव के मुद्दों के ऊपर गंभीर टिप्पणी की है। जॉन कहते हैं की मुझे याद है मुंबई के धमाके और लोगों का गुस्सा लेकिन ये क्या चुनाव मैं इसका कोई जिक्र ही नही। नंदीग्राम की आग, पता नही वो भी इतनी जल्दी कैसे बुझ गई। चलिए अब देश से बाहर निकलते हुए दुनिया की बातें करते हैं। चारों तरफ़ आर्थिक मंदी का दौर लेकिन ये क्या भारत के आम चुनाव मैं ये भी मुद्दा नही बन सका। मैं कुछ बातें और भी इसमे जोरना चाहूँगा। पकिस्तान के हालात, नेपाल में राजनितिक संकट और सबसे महत्वपूर्ण बात भारत के अन्दर अलगाववाद की राजनीति (राज ठाकरे जैसे नेताओं द्बारा प्रायोजित ), विडम्बना ये हैं की इनमें सो कुछ भी मुद्दा इस आम चुनाव मैं देखने को नही मिला। पप्पू कान्त डांस के तर्ज़ पर पप्पू कान्त वोट तो काफी सुनाई दिया लेकिन आरक्षण की आग भी चुनाव के बयार मैं कहीं न दिखी न सुनी गई।

सचमुच ये काफी खतरनाक समय है और इसका सही आंकलन तो चुनाव के नतीजों के बाद ही दिखाई देगा। देखना ये है की नेताओं के प्रायोजित मुद्दे ही जनता का भी मुद्दा रहा या फ़िर जनता ने चुपचाप एक ऐसी सज़ा सुना दी है भ्रस्त नेताओं को जो उन्हें चौंका देगी।