बहुत दिन हो गए। चलो, एक बार फ़िर से दो बातें कर लें। जब इस ब्लॉग की शुरुआत की थी तो सोचा था, इसी बहने कुछ हिन्दी मैं बतिया लिया करेंगे। लेकिन, लगता है, ज्यादती कर दी मैंने, अपना वादा जो भूल गया।
फ़िर आज अचानक कैसे? हाँ भाई, कभी-कभी ख़ुद से बात करने का मौक़ा मिल ही जाता है और फ़िर कितनी दूर भागोगे अपने आप से? दरअसल बात कुछ यूँ है की पत्रकारिता मैं स्नातक करने के बाद जब सोफ्टवेयर कंपनी में नौकरी करनी शुरू कर दी तो लगभग नामुमकिन सा लगने लगा था वापस पत्रकारिता में आना। लेकिन, आज महानायक अमिताभ बच्चन का एक डायलोग याद आता है "सच बड़ा ही अजीबोगरीब होता है ये सच अक्सर, असामान्य अद्भुद कल्पना से भी ज्यादा विचित्र होता है यह सच अक्सर"। हाँ भाई, मेरी किस्मत ने मुझे एक पत्रिका से जोड़ दिया है। लेकिन, विडम्बना देखिये की अभी भी हिन्दी ने नही बल्कि अंग्रेजी ने अपनाया है। कभी-कभी सोचता हूँ की हिन्दी से हिन्दी प्रेमियों को आख़िर दूर कौन कर रहा है?
नाम नही बताऊंगा लेकिन कुछ ख़ास और कुछ आम जान-पहचान वाले लोग मीडिया से जुरे लोग गलती से ही सही लेकिन इस तथ्य को जरुर काबुल करते हैं की दरअसल "हिन्दी मीडिया" भी कुछ बिचौलियों के जाल में उलझ कर रह गई है। ऐसे लोग जो हिन्दी को अंग्रेजी और अंग्रेजी को हिन्दी से जोरने में महारथ हासिल कर रखे हैं। यकीन न आए तो आप कुछ नामी-गिरामी हिन्दी और अंग्रेजी के पत्रकारों के नाम गूगल में टाइप करके देख लीजिये। अंग्रेजी में टाइप करके देखिएगा तो उनकी अंग्रेजी लेखनी और अंग्रेजी विचार सामने आयेंगे फ़िर जब हिन्दी में टाइप कीजियेगा तो हिन्दी विचार सामने आयेंगे। आपको सावधानी बस एक ही बरतनी होगी, कृपया उन दोनों ही लेखनी की तुलना किसी भी दृष्टि से न करें। यह कोई चेतावनी नही, महज सलाह है। भाई जनतंत्र है, चेतावनी देने की हिम्मत कौन करे।
उफ़, लगता है में कुछ ज्यादा ही बोल दिया, आप सोच रहे होंगे भरांस निकाल रहा है। किसी हिन्दी पत्रकार ने शायद इसकी "मार-ली" है। भाई, आपकी इस सोच का मुझको कोई दुःख नही, अपनी बात कहने का दिल किया तो कह दी। बांकी, दुनिया की मर्जी, "ज़ले या बुझी अपनी बला से"। कितना स्वार्थी हो गया हूँ में, कितनी बेवाक बातें कर देता हूँ, कभी-कभी।
खैर! असल बात तो कहना भूल ही गया। दोस्तों, स्नातक में हिन्दी पत्रकारिता से की है और नौकरी विज्ञान विषय की एक अंग्रेजी पत्रकारिता में कर रहा हूँ। काफ़ी इज्ज़त दी है अंग्रेजी वालों ने, उप-संपादक का पद दिया है, कृतज्ञ बना दिया है, मुझे। शायद, हिन्दी की बेवफाई ने इतना कुछ कहलवा दिया। माफ़ करना, लेकिन सोचना जरुर। आख़िर हिन्दी अपनों से ही इतनी दूर क्यूँ जा रही है।
आज ही एक ख़बर पढ़ी "Google launches contest to promote Hindi content on इन्टरनेट"। क्यूँ खुस हो गए होंगे आप की वाह क्या बात है, इन्टरनेट पर हिन्दी के लिए क्या कुछ नही हो रहा। लेकिन में बिल्कुल खुस नही हुआ। सचमुच बहुत ही दुःख होता है ये सोचकर की हिन्दुस्तान के अन्दर एक बाहर का आदमी जब आकर "हिन्दी" की बात करता है तो हम इसपर गर्व करते हैं लेकिन आपस में ही हिन्दी के नाम पर किसी भी सड़क-छाप नेता के बहकाने पर लड़ना शुरू कर देते हैं। समझ नही आता, क्या हम हिन्दुस्तानी मानसिक रूप से इतने दिवालिया हो गए हैं की किसी की भी बातों में आ जाते हैं। आखिकार ये कब-तक चलेगा की ख़ुद के घर को बनने और सजाने के लिए भी माइक्रोसॉफ्ट और गूगल की तरफ़ हम निहार रहे होंगे। क्या इसी सोच के साथ हम दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति बनने का ख्वाब देख रहे हैं। अगर ऐसा हो, तो मुझे शर्म आ रही है हिन्दुस्तानी और हिन्दी-भाषी बनने में।
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